जनगणना 2011 के रिलीज आंकड़ों से भारतीय मासूमों की हकीकत सामने आयी है।
नई दिल्ली। एक ओर जहां पूरे देश में
शिक्षा दर को बेहतर बनाने के लिए केंद्र की ओर से असंख्य योजनाएं व स्कीम
लांच की जा रही हैं वहीं हाल में रिलीज हुए जनगणना 2011 के आंकड़ों से भारत
में शिक्षा और बाल श्रम से जुड़ी चौंकाने वाली बातें सामने आयी हैं।
2011 जनगणना के आंकड़ों से पता चला कि
78 लाख भारतीय बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं वहीं 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल
ही नहीं जाते। हालांकि छात्रों की पूरी जनसंख्या की तुलना में मजदूरी करने
वाले बच्चों की संख्या कम है। परिवारों व बच्चों के बीच शिक्षा को कितना
महत्व दिया जा रहा है इसे दिखाने के लिए यह आंकड़ा काफी है। इसके जरिए
शिक्षा के बढ़ते खर्च की ओर भी संकेत किया गया है जिससे यह निष्कर्ष निकलता
है कि 5 से 17 साल की उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलनी चाहिए। काम
करने वाले छात्र-छात्राओं में 43 फीसद लड़कियां और 57 फीसद लड़के हैं।
पितृसत्तात्मक देश में यह कोई अचरज की बात नहीं जहां वर्कफोर्स में केवल 27
फीसद महिलाएं हैं।
आपको यह जानकर और हैरानी होगी की बाल
श्रमिकों में 6 साल के मासूम भी हैं। इसी तरह से चौंकाने वाली बात यह भी है
कि 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते जो कि उस कैटेगरी का करीब 20 फीसद
हिस्सा है जो राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत आता है। बच्चों को केवल शिक्षा
दिया जाना है पर उन्हें मिलने वाली शिक्षा का स्तर अच्छा नहीं है। हर
क्षेत्र में नेतृत्व की कमी है चाहे वह राजनीतिक, शैक्षिक या सामाजिक है।
बच्चों के स्कूल न जाने का सबसे सरल कारण है कि उन्हें काम करने को मजबूर
होना पड़ता है।

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